July 15, 2026 6:38 pm

“अयोग्यता के आधार पर MLA पेंशन रोकना असंवैधानिक—डिस्क्वालिफिकेशन प्रावधान में ऐसा कोई अधिकार नहीं”“राज्यपाल की स्वीकृति के बिना संशोधन बेअसर—कोर्ट गए तो बहाल होगी पेंशन”: राकेश जमवाल

शिमला,अप्रैल।भाजपा के मुख्य प्रवक्ता राकेश जमवाल ने 14वीं विधानसभा के दौरान अयोग्य घोषित विधायकों की पेंशन रोकने के लिए लाए गए संशोधन पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इसे असंवैधानिक, विधि-विरुद्ध और मनमाना कदम बताया है।राकेश जमवाल ने कहा कि यह संशोधन उन विधायकों को लक्षित करता है जिन्हें Schedule 2(1)(a) के अंतर्गत अयोग्य घोषित किया गया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि संविधान में पहले से ही अयोग्यता से संबंधित प्रावधान मौजूद हैं, जो यह निर्धारित करते हैं कि यदि कोई सदस्य अपनी पार्टी बदलता है या पार्टी लाइन के विरुद्ध जाता है, तो उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता है।“लेकिन यह प्रावधान केवल सदस्यता समाप्त करने तक सीमित है, इसमें कहीं भी पेंशन रोकने या समाप्त करने की बात नहीं की गई है,” उन्होंने कहा।उन्होंने कहा कि अयोग्यता को पेंशन से जोड़ना पूरी तरह से कानून की गलत व्याख्या है।“यह कहना कि ‘आप अयोग्य हुए हैं, इसलिए आपकी पेंशन भी रोकी जाएगी’—इसका कोई संवैधानिक आधार नहीं है। पेंशन का विषय अयोग्यता के प्रावधानों के दायरे में नहीं आता,” जमवाल ने स्पष्ट किया।राकेश जमवाल ने आगे कहा कि यह संशोधन अभी तक कानूनी रूप से प्रभावी नहीं हुआ है।“जब तक इस संशोधन को राज्यपाल (और आवश्यक होने पर राष्ट्रपति) की स्वीकृति नहीं मिलती और इसे आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित नहीं किया जाता, तब तक इसका कोई कानूनी अस्तित्व नहीं है,” उन्होंने कहा।उन्होंने इस पूरे कदम को मनमाना बताते हुए कहा कि इस प्रकार पेंशन रोकने की कोशिश संविधान के विरुद्ध है।“यह एक ऐसा प्रयास है जिसमें कुछ व्यक्तियों की पेंशन रोकने के लिए कानून का गलत उपयोग किया जा रहा है, जो न्यायिक जांच में टिक नहीं पाएगा,” उन्होंने कहा।राकेश जमवाल ने आगे स्पष्ट किया कि यदि प्रभावित व्यक्ति न्यायालय का रुख करते हैं, तो उन्हें निश्चित रूप से राहत मिलेगी।“अगर चैतन्य ठाकुर और देवेंद्र भुट्टो कोर्ट जाते हैं, तो उनकी पेंशन भी निश्चित रूप से बहाल होगी, क्योंकि संविधान के विपरीत कोई भी प्रावधान टिक नहीं सकता,” उन्होंने कहा।अंत में उन्होंने कहा कि“संविधान के विपरीत कोई भी कानून या संशोधन लंबे समय तक टिक नहीं सकता—कानून मनमाने ढंग से नहीं बनाए जा सकते।”

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