शिमला,जून। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में किसी देश की शक्ति का आकलन प्रायः उसकी सैन्य क्षमता, आर्थिक सामर्थ्य और भू-राजनीतिक प्रभाव से किया जाता है। लेकिन इतिहास बार-बार यह सिद्ध करता है कि किसी राष्ट्र के नेतृत्व की सबसे बड़ी परीक्षा केवल युद्ध छेड़ने की क्षमता नहीं, बल्कि उसे उचित समय पर समाप्त करने की बुद्धिमत्ता भी है। बहुत कम देश ऐसे हैं जो सीमित और स्पष्ट उद्देश्यों को निर्धारित कर उन्हें सटीकता से प्राप्त करने के बाद संघर्ष को अनावश्यक रूप से लंबा किए बिना समाप्त करने का अनुशासन दिखा पाते हैं।20वीं और 21वीं सदी के अनेक संघर्ष इस बात के साक्षी हैं कि स्पष्ट उद्देश्यों के साथ शुरू हुए युद्ध अक्सर लंबे और थकाऊ संघर्षों में बदल गए। वियतनाम युद्ध सैन्य शक्ति की सीमाओं का एक बड़ा उदाहरण बना। अफगानिस्तान ने दो दशकों तक अपार संसाधनों को निगल लिया। रूस-यूक्रेन संघर्ष आज भी दोनों देशों और पूरी दुनिया पर भारी आर्थिक और मानवीय बोझ डाल रहा है। पश्चिम एशिया बार-बार संघर्षों और अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है, जिससे क्षेत्रीय शांति और कूटनीतिक प्रयास प्रभावित हुए हैं।इन सभी उदाहरणों में एक समान तत्व दिखाई देता है—सैन्य शक्ति की कमी नहीं, बल्कि संघर्ष से सम्मानजनक और स्थायी निकास का अभाव। ऐसे समय में भारत की रणनीतिक सोच एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करती है। पिछले कई दशकों में भारत ने बार-बार यह दिखाया है कि वह सीमित और लक्ष्य-आधारित सैन्य अभियानों को सफलतापूर्वक अंजाम देकर उन्हें उचित समय पर समाप्त करने की क्षमता रखता है।भारत का जोर हमेशा विस्तारवादी युद्ध के बजाय सटीक कार्रवाई, कब्जे के बजाय प्रतिरोधक क्षमता और अंतहीन संघर्ष के बजाय स्पष्ट रणनीतिक परिणामों पर रहा है। वर्ष 1999 का कारगिल युद्ध इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। भारत की क्षेत्रीय अखंडता को चुनौती मिलने पर देश ने दृढ़ता और प्रभावी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन किया, लेकिन उसका लक्ष्य स्पष्ट था—अवैध कब्जों को हटाना और यथास्थिति बहाल करना। भारी उकसावे के बावजूद भारत ने संघर्ष को व्यापक क्षेत्रीय युद्ध में नहीं बदलने दिया और उद्देश्य पूरा होते ही सैन्य अभियान समाप्त कर दिया।यही सिद्धांत वर्षों बाद उरी आतंकी हमले के बाद की गई सर्जिकल स्ट्राइक में भी दिखाई दिया। भारत ने खतरे की पहचान की, सीमित और सटीक कार्रवाई की, अपना संदेश स्पष्ट रूप से दिया और स्थिति को अनावश्यक रूप से नहीं बढ़ने दिया।इसी प्रकार पुलवामा हमले के बाद बालाकोट एयर स्ट्राइक ने यह दर्शाया कि भारत आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करने में सक्षम है, लेकिन साथ ही वह व्यापक रणनीतिक संतुलन बनाए रखने की क्षमता भी रखता है। इस अभियान ने स्पष्ट संदेश दिया, किंतु इसे लंबे सैन्य टकराव में नहीं बदलने दिया गया।हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर ने भी इसी सोच को आगे बढ़ाया। यह अभियान स्पष्ट उद्देश्यों पर आधारित था, सटीकता से संचालित किया गया और लक्ष्य प्राप्त होते ही समाप्त कर दिया गया।ऐसी कार्रवाइयों को केवल सैन्य सफलता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। ये सशस्त्र बलों, खुफिया एजेंसियों, कूटनीतिक तंत्र और राजनीतिक नेतृत्व के बीच उत्कृष्ट समन्वय का परिणाम हैं। आधुनिक युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जाते। अंतरराष्ट्रीय जनमत, आर्थिक मजबूती, तकनीकी क्षमता और कूटनीतिक विश्वसनीयता भी उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गतिशील नेतृत्व में भारत ने वैश्विक मंच पर अपनी स्थिति को उल्लेखनीय रूप से मजबूत किया है। पिछले एक दशक में भारत ने अपने कूटनीतिक संबंधों का विस्तार किया, रणनीतिक साझेदारियों को मजबूत किया और स्वयं को एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित किया है। वैक्सीन मैत्री जैसी पहल ने यह सिद्ध किया कि भारत अपनी राष्ट्रीय क्षमताओं का उपयोग केवल अपनी सुरक्षा के लिए ही नहीं, बल्कि वैश्विक हित के लिए भी कर सकता है।शक्ति और जिम्मेदारी का यही संतुलन भारत की विश्वसनीयता को बढ़ाता है। जिस राष्ट्र पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय भरोसा करता है, उसे अपने सुरक्षा हितों की रक्षा के लिए अधिक कूटनीतिक अवसर प्राप्त होते हैं। ऐसे में आवश्यक सैन्य कार्रवाई भी एक जिम्मेदार राष्ट्र के व्यापक आचरण के संदर्भ में देखी जाती है।यह संदेश आज विशेष रूप से प्रासंगिक है, जब हम पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को देख रहे हैं। लंबे युद्ध राष्ट्रीय संसाधनों को समाप्त करते हैं, आर्थिक विकास को बाधित करते हैं, सामाजिक तनाव बढ़ाते हैं और विकास की प्राथमिकताओं से ध्यान भटकाते हैं।इसलिए युद्ध तभी तक चलना चाहिए जब तक उसका मूल उद्देश्य पूरा न हो जाए। युद्ध शुरू करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है, लेकिन यह सुनिश्चित करना कठिन होता है कि उसका अंत किस प्रकार होगा और कौन विजेता बनेगा। सबसे कठिन विजय युद्ध जीतना नहीं, बल्कि शांति स्थापित करना है।यही कारण है कि वास्तविक नेतृत्व और राज्यकला का मूल्यांकन इस बात से होता है कि कोई राष्ट्र अपने हितों की रक्षा करते हुए अनावश्यक कीमत चुकाने से कैसे बचता है। भारत का अनुभव यह संकेत देता है कि एक परिपक्व रणनीतिक सिद्धांत विकसित हो रहा है, जो उद्देश्य की स्पष्टता, कार्रवाई की सटीकता और विस्तार से बचने के संयम पर आधारित है।यह न तो निष्क्रियता का सिद्धांत है और न ही निरंतर टकराव का। यह संतुलित और जिम्मेदार शक्ति प्रयोग का सिद्धांत है, जिसमें सैन्य शक्ति को साधन माना जाता है, लक्ष्य नहीं। इसमें संघर्ष की शुरुआत जितनी महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण उसका परिणाम और समापन है।आज जब दुनिया में अनेक संघर्ष शुरू करना आसान और समाप्त करना कठिन साबित हो रहे हैं, तब यह क्षमता भारत की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक शक्तियों में से एक बन सकती है। एक उभरती हुई वैश्विक शक्ति की पहचान केवल संघर्ष में प्रवेश करने की क्षमता से नहीं होती, बल्कि अपने उद्देश्यों को प्राप्त कर स्थिरता बनाए रखने, राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने और सही समय पर संघर्ष को समाप्त करने की क्षमता से होती है।भारत ने पिछले वर्षों में दृढ़ संकल्प और संयम का यह दुर्लभ संतुलन प्रदर्शित किया है। समकालीन रणनीतिक चिंतन में इस विशेषता को अधिक मान्यता मिलनी चाहिए।











