July 14, 2026 11:09 pm

पाँच दिवसीय कला शिविर “कांगड़ा लघुचित्रों में लोक और ग्राम्य जीवन का चित्रण : भारतीय देशज कला-परंपरा का परिप्रेक्ष्य” का विधिवत शुरु।

:शिमलाजून। भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (आईआईएएस), राष्ट्रपति निवास, शिमला में सोमवार को पाँच दिवसीय कला शिविर “कांगड़ा लघुचित्रों में लोक और ग्राम्य जीवन का चित्रण : भारतीय देशज कला-परंपरा का परिप्रेक्ष्य” का विधिवत शुभारंभ हुआ। 15 से 19 जून तक आयोजित होने वाले इस विशिष्ट कला शिविर का उद्देश्य कांगड़ा लघुचित्र परंपरा तथा चंबा रूमाल जैसी हिमालयी लोक कलाओं के माध्यम से लोक जीवन, ग्रामीण संस्कृति और भारतीय देशज ज्ञान परंपरा के विविध आयामों को सृजनात्मक रूप में अभिव्यक्त करना है।संस्थान के सिद्धार्थ विहार स्थित सेमिनार हॉल में आयोजित उद्घाटन सत्र में भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान के सचिव श्री मेहर चंद नेगी ने उपस्थित कलाकारों, विद्वानों और प्रतिभागियों का स्वागत वक्तव्य प्रदान किया।कला शिविर के संयोजक एवं भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान के पूर्व फेलो डॉ. पंकज गुप्ता ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि कांगड़ा लघुचित्र परंपरा को सामान्यतः पौराणिक आख्यानों, ऋतु-वर्णन और प्राकृतिक सौंदर्य के चित्रण के लिए जाना जाता है, किंतु इसके भीतर लोक जीवन, ग्राम्य संस्कृति, कृषक समाज, लोक उत्सवों और पहाड़ी जनजीवन का एक अत्यंत समृद्ध किन्तु अपेक्षाकृत कम चर्चित पक्ष भी विद्यमान है। उन्होंने बताया कि इस कला शिविर का उद्देश्य इन्हीं लोकाभिव्यक्तियों को समकालीन संदर्भों में पुनर्सृजित करना तथा उन्हें भावी पीढ़ियों के लिए संरक्षित करना है।अपने उद्घाटन उद्बोधन में भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान के निदेशक प्रोफेसर हिमांशु कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक परंपरा में लोक जीवन और कला का संबंध अत्यंत गहरा और अविभाज्य रहा है। भारतीय कला की वास्तविक शक्ति उसकी जड़ों, उसकी स्थानीयता और समाज के सामान्य जनजीवन से प्राप्त होती है। उन्होंने कहा कि आज जब अनेक पारंपरिक कला विधाएँ समय के साथ विलुप्ति के संकट का सामना कर रही हैं, ऐसे में इस प्रकार के कला शिविर न केवल कलाकारों को रचनात्मक मंच उपलब्ध कराते हैं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और उसके अकादमिक अध्ययन की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।उन्होंने कहा कि भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान द्वारा आरंभ की गई यह पहल गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की उस सांस्कृतिक दृष्टि से भी प्रेरित है, जिसमें कला, प्रकृति और ग्राम्य जीवन को भारतीय सभ्यता की आत्मा के रूप में देखा गया है। संस्थान का टैगोर सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ कल्चर एंड सिविलाइज़ेशन भी इसी व्यापक दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने के लिए निरंतर कार्य कर रहा है।इस पाँच दिवसीय कला शिविर में छह प्रतिष्ठित कांगड़ा लघुचित्र कलाकार तथा दो वरिष्ठ चंबा रूमाल कलाकार सहभागिता कर रहे हैं। शिविर के दौरान कलाकार भारतीय लोक एवं ग्राम्य जीवन, कृषि संस्कृति, पारंपरिक पर्व-त्योहारों, लोक आस्थाओं तथा हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत पर आधारित मौलिक कलाकृतियों का सृजन करेंगे। इन कलाकृतियों को भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान के स्थायी संग्रह का हिस्सा बनाया जाएगा, ताकि देश-विदेश से आने वाले विद्वान, शोधार्थी, विद्यार्थी और पर्यटक हिमालयी कला परंपराओं के इस जीवंत आयाम से परिचित हो सकें।कला शिविर के समापन अवसर पर 19 जून, 2026 को दोपहर 2:00 बजे संस्थान परिसर स्थित पुस्तकालय भवन में इन कलाकृतियों पर आधारित विशेष प्रदर्शनी एवं नव-विकसित कला दीर्घा का *उद्घाटन हिमाचल प्रदेश के माननीय राज्यपाल श्री कविंदर गुप्ता द्वारा किया जाएगा।* इस प्रदर्शनी में कला शिविर के दौरान सृजित चुनिंदा कृतियों को प्रदर्शित किया जाएगा, जो लोक और ग्राम्य जीवन की भारतीय अवधारणा को कांगड़ा लघुचित्र शैली और चंबा रूमाल कला के माध्यम से एक नवीन दृश्यात्मक अभिव्यक्ति प्रदान करेंगी।भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान का मानना है कि यह कला शिविर और इसके उपरांत आयोजित प्रदर्शनी पारंपरिक कलाकारों को संस्थागत मान्यता प्रदान करने, देशज कला परंपराओं के संरक्षण को प्रोत्साहन देने तथा अकादमिक समुदाय और समाज के व्यापक वर्गों के बीच भारतीय लोक सांस्कृतिक विरासत के प्रति नई जागरूकता उत्पन्न करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल सिद्ध होगी।आज के कार्यक्रम का संचालन डॉ. अखिलेश पाठक, पीआरओ, भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान द्वारा किया गया तथा अंत में डॉ. राजीव मिश्रा, पुस्तकलयाध्यक्ष एवं अकादमिक संसाधन अधिकारी ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। उद्घाटन सत्र में संस्थान के अधिकारी, फेलोज़, शोधार्थी, कलाकार, विद्यार्थी तथा कला एवं संस्कृति के क्षेत्र से जुड़े अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।

और पढ़ें

Cricket Live Score

Corona Virus

Rashifal

और पढ़ें

error: Content is protected !!