शिमला,जून। स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई), हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय इकाई ने हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में प्रो-वाईस चांसलर के पद को समाप्त करने तथा वर्तमान कार्यकाल समाप्त होने के बाद इस पद पर किसी भी नई नियुक्ति न करने की मांग उठाई है। इस संबंध में संगठन ने विश्वविद्यालय के कुलपति को एक ज्ञापन सौंपकर सरकार से विश्वविद्यालय में वित्तीय अनुशासन सुनिश्चित करने तथा छात्रों पर बढ़ते आर्थिक बोझ को कम करने की दिशा में ठोस कदम उठाने की मांग की है।एसएफआई ने अपने ज्ञापन में कहा है कि वर्तमान समय में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय गंभीर वित्तीय चुनौतियों का सामना कर रहा है। सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन लगातार वित्तीय संसाधनों की कमी का हवाला देते हुए छात्रों पर फीस वृद्धि का बोझ डाल रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न पाठ्यक्रमों, परीक्षाओं, छात्रावासों तथा अन्य सेवाओं से संबंधित शुल्कों में लगातार बढ़ोतरी की गई है, जिसका सीधा प्रभाव गरीब, ग्रामीण तथा मध्यम वर्गीय परिवारों से आने वाले विद्यार्थियों पर पड़ा है।संगठन ने कहा कि शिक्षा किसी भी लोकतांत्रिक समाज का बुनियादी अधिकार है और उच्च शिक्षा तक सभी वर्गों की समान पहुंच सुनिश्चित करना सरकार तथा विश्वविद्यालय प्रशासन की जिम्मेदारी है। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि वित्तीय संकट का समाधान खोजने के बजाय उसका भार छात्रों पर डाला जा रहा है। बढ़ती फीस के कारण अनेक छात्र उच्च शिक्षा प्राप्त करने से वंचित हो रहे हैं तथा कई विभागों और पाठ्यक्रमों में प्रवेश संख्या में गिरावट भी देखने को मिली है।एसएफआई ने कहा कि यदि विश्वविद्यालय वास्तव में वित्तीय संकट से जूझ रहा है तो सबसे पहले उन प्रशासनिक व्यवस्थाओं की समीक्षा की जानी चाहिए जिन पर भारी मात्रा में सार्वजनिक धन खर्च किया जा रहा है, लेकिन जिनकी उपयोगिता सीमित दिखाई देती है। इसी संदर्भ में संगठन ने प्रो-वाईस चांसलर के पद की आवश्यकता पर गंभीर प्रश्न उठाए हैं।ज्ञापन में कहा गया है कि प्रो-वाईस चांसलर के पद को बनाए रखने के लिए विश्वविद्यालय को प्रतिवर्ष बड़ी राशि खर्च करनी पड़ती है। इस पद के साथ वेतन और भत्तों के अतिरिक्त सरकारी वाहन, चालक, सुरक्षा कर्मी, निजी सचिव, लिपिकीय स्टाफ, कार्यालय व्यवस्था तथा अन्य प्रशासनिक सुविधाओं पर भी पर्याप्त खर्च किया जाता है। ऐसे समय में जब विश्वविद्यालय वित्तीय संसाधनों की कमी का हवाला देकर छात्रों की फीस बढ़ा रहा है, तब इस प्रकार के खर्चों का औचित्य पुनः जांचा जाना आवश्यक है।एसएफआई का कहना है कि विश्वविद्यालय की अधिकांश प्रशासनिक और वैधानिक शक्तियां कुलपति के पास निहित हैं तथा महत्वपूर्ण निर्णयों के लिए अंततः कुलपति की स्वीकृति आवश्यक होती है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि प्रो-वाईस चांसलर के पद की वास्तविक प्रशासनिक उपयोगिता क्या है और क्या इस पद को बनाए रखना वर्तमान परिस्थितियों में आवश्यक है।संगठन ने कहा कि सार्वजनिक संस्थानों में समय-समय पर प्रशासनिक ढांचे की समीक्षा होना लोकतांत्रिक और जिम्मेदार शासन का हिस्सा है। यदि कोई पद या व्यवस्था अपने खर्च के अनुपात में पर्याप्त उपयोगिता सिद्ध नहीं कर पा रही है, तो उसकी आवश्यकता का पुनर्मूल्यांकन किया जाना चाहिए। विश्वविद्यालय जैसे शैक्षणिक संस्थानों में संसाधनों का प्राथमिक उपयोग छात्रों और शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए होना चाहिए, न कि अनावश्यक प्रशासनिक विस्तार के लिए।एसएफआई ने अपने ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया है कि सरदार पटेल विश्वविद्यालय, मंडी की स्थापना के बाद हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय का प्रशासनिक और शैक्षणिक क्षेत्राधिकार पहले की तुलना में काफी कम हो गया है। विश्वविद्यालय के अधीन आने वाले अनेक महाविद्यालय अब दूसरे विश्वविद्यालय के अंतर्गत आ चुके हैं। ऐसी स्थिति में विश्वविद्यालय के प्रशासनिक दायरे में आई कमी को देखते हुए यह आवश्यक हो जाता है कि वर्तमान प्रशासनिक संरचना की प्रासंगिकता का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन किया जाए।संगठन ने तर्क दिया कि जब विश्वविद्यालय का दायरा पहले की तुलना में छोटा हुआ है, तब प्रशासनिक खर्चों में भी तर्कसंगत कमी की दिशा में कदम उठाए जाने चाहिए। यदि संस्थान के कार्यभार में कमी आई है तो उन पदों की आवश्यकता पर भी विचार किया जाना चाहिए जिनकी स्थापना एक बड़े प्रशासनिक ढांचे को ध्यान में रखकर की गई थी।एसएफआई ने विश्वविद्यालय के इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 1970 में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद लंबे समय तक प्रो-वाईस चांसलर का पद रिक्त रहा है और इसे केवल कुछ अवसरों पर ही भरा गया। इन लंबे अंतरालों के दौरान विश्वविद्यालय का प्रशासनिक और शैक्षणिक कार्य सुचारू रूप से चलता रहा। इससे स्पष्ट होता है कि विश्वविद्यालय की नियमित कार्यप्रणाली इस पद पर निर्भर नहीं रही है।संगठन का मानना है कि यदि विश्वविद्यालय दशकों तक बिना प्रो-वाईस चांसलर के प्रभावी ढंग से कार्य कर सकता है, तो वर्तमान परिस्थितियों में इस पद को बनाए रखने की आवश्यकता और भी कमजोर हो जाती है। इसलिए सरकार को ऐतिहासिक अनुभवों और वर्तमान परिस्थितियों दोनों को ध्यान में रखते हुए इस पद की उपयोगिता का गंभीर मूल्यांकन करना चाहिए।एसएफआई ने स्पष्ट किया कि यह मांग किसी व्यक्ति विशेष के विरोध में नहीं है, बल्कि यह विश्वविद्यालय के संसाधनों के बेहतर उपयोग और छात्रों के हितों की रक्षा से जुड़ा मुद्दा है। संगठन का कहना है कि जब छात्रों को लगातार अधिक फीस देने के लिए मजबूर किया जा रहा हो, तब उच्च लागत वाले प्रशासनिक पदों को बनाए रखना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता।संगठन ने कहा कि विश्वविद्यालय के सीमित वित्तीय संसाधनों को उन क्षेत्रों में निवेश किया जाना चाहिए जो सीधे तौर पर छात्रों और शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करते हों। यदि प्रो-वाईस चांसलर के पद पर होने वाले खर्च को बचाया जाता है, तो उस राशि का उपयोग अनेक महत्वपूर्ण क्षेत्रों में किया जा सकता है।एसएफआई ने सुझाव दिया कि इन संसाधनों का उपयोग छात्रवृत्ति योजनाओं को मजबूत करने, अनुसंधान सुविधाओं के विस्तार, पुस्तकालयों के आधुनिकीकरण, प्रयोगशालाओं के उन्नयन, छात्रावास सुविधाओं में सुधार, डिजिटल अवसंरचना के विकास तथा आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए सहायता कार्यक्रमों को बढ़ाने में किया जा सकता है।संगठन ने कहा कि विश्वविद्यालय की वास्तविक प्रगति प्रशासनिक पदों की संख्या बढ़ाने से नहीं, बल्कि छात्रों और शिक्षकों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने से सुनिश्चित होगी। आज आवश्यकता इस बात की है कि विश्वविद्यालय अपने संसाधनों का उपयोग शैक्षणिक उत्कृष्टता, अनुसंधान और छात्र कल्याण के लिए करे।एसएफआई ने इस मुद्दे को व्यापक वित्तीय जवाबदेही और सार्वजनिक संसाधनों के उचित उपयोग से भी जोड़ा। संगठन का कहना है कि सरकारें लगातार वित्तीय अनुशासन और खर्चों के युक्तिकरण की बात करती हैं। यदि यह सिद्धांत वास्तव में लागू किया जाना है, तो इसकी शुरुआत उन प्रशासनिक व्यवस्थाओं की समीक्षा से होनी चाहिए जिनकी आवश्यकता संदिग्ध है और जिन पर सार्वजनिक धन का बड़ा हिस्सा खर्च होता है।संगठन ने राज्य सरकार से मांग की है कि वर्तमान प्रो-वाईस चांसलर का कार्यकाल समाप्त होने के बाद इस पद पर कोई नई नियुक्ति न की जाए तथा विश्वविद्यालय की प्रशासनिक आवश्यकताओं का व्यापक अध्ययन करवाकर इस पद को समाप्त करने पर विचार किया जाए। ऐसा निर्णय न केवल वित्तीय अनुशासन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा, बल्कि इससे यह संदेश भी जाएगा कि सरकार छात्रों के हितों और सस्ती उच्च शिक्षा के प्रति गंभीर है।एसएफआई ने आशा व्यक्त की कि सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन इस मांग पर सकारात्मक विचार करेंगे तथा ऐसे निर्णय लेंगे जो छात्रों, शिक्षा व्यवस्था और व्यापक जनहित के अनुरूप हों। संगठन ने कहा कि सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग उन क्षेत्रों में होना चाहिए जो सीधे तौर पर शैक्षणिक विकास और छात्र कल्याण में योगदान देते हैं।अंत में एसएफआई ने दोहराया कि वह शिक्षा के व्यापारीकरण, फीस वृद्धि, सार्वजनिक शिक्षा पर घटते निवेश तथा छात्रों पर बढ़ते आर्थिक बोझ के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाता रहेगा। संगठन ने कहा कि उच्च शिक्षा को सभी वर्गों के लिए सुलभ और किफायती बनाए रखना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।











