July 14, 2026 10:06 am

एचपीयू में एसोसिएट प्रोफेसरों की नियुक्तियों में गंभीर अनियमितताओं का आरोप: एसएफआई ने कुलपति को सौंपा ज्ञापन, न्यायिक जांच, अवैध नियुक्तियों की समीक्षा और फीस वृद्धि वापस लेने की मांग।

शिमला,जुलाई। स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय इकाई ने राज्य अध्यक्ष सनी सेक्टा के नेतृत्व में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के कुलपति को कुलसचिव के माध्यम से एक विस्तृत ज्ञापन सौंपकर विश्वविद्यालय में विभिन्न विषयों में एसोसिएट प्रोफेसरों की नियुक्तियों में प्रथम दृष्टया सामने आई गंभीर अनियमितताओं की स्वतंत्र एवं समयबद्ध न्यायिक जांच की मांग की है। यह ज्ञापन विशेष रूप से विज्ञापन संख्या Rectt. 17/2019 तथा Rectt. 21/2020 के अंतर्गत गणित, अंग्रेजी, पत्रकारिता एवं जनसंचार, माइक्रोबायोलॉजी तथा समाजशास्त्र विषयों में हुई नियुक्तियों से संबंधित है।एसएफआई विश्वविद्यालय इकाई के परिसर सचिव मुकेश कुमार तथा अध्यक्ष आशीष कुमार ने संयुक्त प्रेस वक्तव्य जारी करते हुए कहा कि भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने अपनी रिपोर्ट संख्या 4, वर्ष 2025 में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की 186 शिक्षकों की भर्तियों में गंभीर अनियमितताओं की ओर संकेत किया है। इसके बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन अब तक किसी स्वतंत्र अथवा न्यायिक जांच की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठा रहा है। उन्होंने कहा कि एसएफआई लंबे समय से तत्कालीन कुलपति सिकंदर कुमार के कार्यकाल में हुई व्यापक भर्ती अनियमितताओं की न्यायिक जांच की मांग कर रही है, किंतु विश्वविद्यालय प्रशासन लगातार इस मांग की उपेक्षा कर रहा है।उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय द्वारा कार्रवाई न किए जाने के कारण एसएफआई सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत प्राप्त विश्वविद्यालय के आधिकारिक अभिलेखों के आधार पर भर्ती मामलों की एक-एक कर जांच कर रही है। जहां-जहां विश्वविद्यालय के अपने दस्तावेजों से प्रथम दृष्टया अनियमितताएं सामने आ रही हैं, वहां विश्वविद्यालय को विधिसम्मत कार्रवाई करने के लिए ज्ञापन दिए जा रहे हैं, ताकि भविष्य में इन कथित अनियमित नियुक्तियों के कारण विश्वविद्यालय पर बढ़ने वाले वित्तीय बोझ को रोका जा सके। एसएफआई का कहना है कि यदि अवैध नियुक्तियों के कारण विश्वविद्यालय पर अनावश्यक वित्तीय भार पड़ता है तो उसका बोझ छात्रों पर फीस वृद्धि के रूप में नहीं डाला जा सकता, इसलिए फीस वृद्धि तत्काल वापस ली जानी चाहिए।ज्ञापन का विषय “यूजीसी विनियम, 2018, सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 तथा सीएजी रिपोर्ट संख्या 4/2025 के आलोक में विज्ञापन संख्या Rectt. 17/2019 एवं Rectt. 21/2020 के अंतर्गत विभिन्न विषयों में एसोसिएट प्रोफेसरों की भर्ती में प्रथम दृष्टया अनियमितताओं की स्वतंत्र जांच” रखा गया है। एसएफआई ने अपने ज्ञापन में उल्लेख किया है कि जांचे गए पांचों मामलों में यूजीसी विनियम, 2018 के अनुभव, शोध प्रकाशन, स्क्रीनिंग तथा चयन प्रक्रिया से संबंधित विभिन्न प्रावधानों के उल्लंघन के प्रथम दृष्टया साक्ष्य सामने आते हैं।एसएफआई ने कहा कि यूजीसी विनियम, 2018 के अनुसार एसोसिएट प्रोफेसर पद के लिए अभ्यर्थी के पास विश्वविद्यालय, महाविद्यालय अथवा मान्यता प्राप्त शोध संस्थान/उद्योग में सहायक प्रोफेसर के समकक्ष पद पर न्यूनतम आठ वर्ष का अध्यापन अथवा शोध अनुभव तथा यूजीसी सूचीबद्ध अथवा पीयर-रिव्यू जर्नलों में कम से कम सात शोध प्रकाशन होना अनिवार्य है। साथ ही विनियम-2018 के क्लॉज-10 के अनुसार अनुभव की गणना संबंधी स्पष्ट प्रावधान हैं, जिनके तहत अतिथि संकाय (Guest Faculty/Guest Lecturer) के रूप में दी गई सेवाओं को पात्रता हेतु अनुभव के रूप में नहीं गिना जा सकता।एसएफआई द्वारा जांचे गए पहले मामले में गणित विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर (आवेदन संख्या 850383011) के संबंध में कहा गया है कि संबंधित अभ्यर्थी यूजीसी-नेट उत्तीर्ण प्रतीत नहीं होतीं तथा उन्हें पीएच.डी. की उपाधि 20 सितंबर 2018 को प्राप्त हुई। उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार यदि अनुभव की गणना पीएच.डी. प्राप्ति की तिथि से की जाए तो 30 जनवरी 2020 तक उनका अनुभव लगभग 1 वर्ष 4 माह 10 दिन ही बनता है, जबकि नियमों के अनुसार आठ वर्ष का अनुभव अनिवार्य था।दूसरे मामले में अंग्रेजी विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर (आवेदन संख्या 828686510) के संबंध में एसएफआई ने आरोप लगाया है कि संबंधित अभ्यर्थी भी यूजीसी-नेट उत्तीर्ण नहीं हैं तथा उन्हें पीएच.डी. 29 सितंबर 2016 को प्राप्त हुई। ज्ञापन के अनुसार यूजीसी विनियम, 2018 के क्लॉज 10(ई) के तहत अतिथि संकाय का अनुभव पात्रता हेतु मान्य नहीं है। यदि केवल वैध अनुभव को जोड़ा जाए तो 30 जनवरी 2020 तक उनका अनुभव लगभग 3 वर्ष 4 माह 1 दिन ही बनता है, जबकि अभिलेखों में वर्ष 2008 से अतिथि संकाय के अनुभव को शामिल किया गया है।तीसरे मामले में पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर (आवेदन संख्या 986709740) के संबंध में एसएफआई ने कहा कि संबंधित अभ्यर्थी यूजीसी-नेट उत्तीर्ण नहीं हैं तथा उन्हें पीएच.डी. 17 सितंबर 2018 को प्राप्त हुई। ज्ञापन में आरोप लगाया गया है कि उनके कई शोध पत्र आवेदन की अंतिम तिथि 30 जनवरी 2020 के बाद प्रकाशित हुए हैं। उपलब्ध आरटीआई अभिलेखों के अनुसार पात्रता की दृष्टि से उनका अनुभव अंतिम तिथि तक लगभग 1 वर्ष 4 माह 13 दिन ही बनता है, जबकि नियमों के अनुसार आठ वर्ष का अनुभव आवश्यक था।चौथे मामले में माइक्रोबायोलॉजी विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर (आवेदन संख्या 512499130) के संबंध में एसएफआई ने कहा कि संबंधित अभ्यर्थी को पीएच.डी. 29 दिसंबर 2014 को प्राप्त हुई। यदि अनुभव की गणना उसी तिथि से की जाए तो 7 जनवरी 2021 तक उनका अनुभव लगभग 6 वर्ष 9 दिन ही बनता है, जबकि आवश्यक अनुभव आठ वर्ष था। एसएफआई का यह भी आरोप है कि उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार उनके पास आवश्यक सात शोध प्रकाशन भी उपलब्ध नहीं थे।पांचवें मामले में आईसीडीईओएल, समाजशास्त्र विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर (आवेदन संख्या 309897823) के संबंध में एसएफआई ने आरोप लगाया है कि उनके अतिथि संकाय के अनुभव को यूजीसी विनियम, 2018 के क्लॉज-10 के विपरीत पात्रता अनुभव के रूप में स्वीकार किया गया। इसके अतिरिक्त स्क्रीनिंग समिति में उनके पीएच.डी. पर्यवेक्षक (Supervisor) को शामिल किया गया, जिसे एसएफआई ने नैतिकता के विरुद्ध बताते हुए कहा कि संबंधित व्यक्ति कई वर्ष पूर्व सेवानिवृत्त हो चुके थे, जबकि विश्वविद्यालय ने विभाग के कार्यरत वरिष्ठ प्रोफेसर को प्रक्रिया में शामिल नहीं किया।एसएफआई ने अपने ज्ञापन में यह भी आरोप लगाया है कि तत्कालीन कुलपति ने हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय अधिनियम, 1970 की धारा 11(1) के अंतर्गत कार्यकारी परिषद (Executive Council) को प्राप्त शक्तियों का अतिक्रमण करते हुए धारा 12-सी(7) की सीमाओं के विपरीत नियुक्तियों से संबंधित अधिकारों का प्रयोग किया, जबकि उक्त प्रावधान कुलपति को नियुक्ति अथवा सेवा समाप्ति का अधिकार प्रदान नहीं करता।एसएफआई ने विश्वविद्यालय प्रशासन से मांग की है कि सीएजी रिपोर्ट संख्या 4/2025 तथा उपलब्ध दस्तावेजों के आलोक में इन सभी नियुक्तियों की स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं समयबद्ध न्यायिक जांच करवाई जाए। यदि जांच में यूजीसी विनियम, 2018, विश्वविद्यालय अधिनियम, विश्वविद्यालय नियमों अथवा अन्य विधिक प्रावधानों का उल्लंघन सिद्ध होता है, तो संबंधित नियुक्तियों की समीक्षा कर आवश्यक वैधानिक कार्रवाई की जाए, अनियमित नियुक्तियों के आधार पर दिए गए वेतन एवं अन्य वित्तीय लाभों की कानून के अनुसार वसूली की जाए तथा दोषी अधिकारियों एवं संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक एवं अन्य विधिक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।एसएफआई ने यह भी मांग की है कि यदि विश्वविद्यालय की वित्तीय स्थिति पर कथित अनियमित नियुक्तियों का प्रभाव पड़ा है, तो उसका भार छात्रों पर नहीं डाला जाना चाहिए। इसलिए प्रस्तावित या लागू की गई फीस वृद्धि तत्काल वापस ली जाए तथा विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गरिमा, पारदर्शिता और सार्वजनिक विश्वास की पुनर्स्थापना के लिए दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए।

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