शिमला,जुलाई।स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई), हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय इकाई ने आज थाना बालूगंज, शिमला में डायरी संख्या 2441/PC के माध्यम से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 173 के अंतर्गत एक औपचारिक शिकायत प्रस्तुत करते हुए हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलसचिव (Registrar) के विरुद्ध प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज करने तथा निष्पक्ष आपराधिक जांच की मांग की है।एसएफआई ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया है कि विश्वविद्यालय के डिपार्टमेंट ऑफ लाइफ लॉन्ग लर्निंग में सहायक प्रोफेसर (अर्थशास्त्र) के पद पर हुई नियुक्ति प्रक्रिया के दौरान भर्ती विज्ञापन, पात्रता शर्तों और चयन प्रक्रिया में गंभीर स्तर पर हेरफेर एवं वैधानिक प्रक्रियाओं की अनदेखी की गई, जिससे न केवल पात्र अभ्यर्थियों के साथ अन्याय हुआ बल्कि विश्वविद्यालय की संस्थागत विश्वसनीयता और सार्वजनिक संसाधनों को भी क्षति पहुंची।एसएफआई के अनुसार, 01 मार्च 2014 को आयोजित विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद (Executive Council) की बैठक में एजेंडा आइटम संख्या-12 के अंतर्गत सहायक प्रोफेसर (अर्थशास्त्र) के पद के लिए पांच वर्ष के शोध अनुभव को अतिरिक्त पात्रता के रूप में शामिल करने का प्रस्ताव रखा गया था। किंतु कार्यकारी परिषद ने इस प्रस्ताव को तत्काल स्वीकृति नहीं दी। परिषद ने स्पष्ट निर्देश दिया कि इस प्रस्ताव को पहले संबंधित बोर्ड ऑफ स्टडीज, संकाय (Faculty) तथा अकादमिक परिषद (Academic Council) से अनुमोदित कराया जाए।
शिकायत के अनुसार कार्यकारी परिषद के इस स्पष्ट निर्णय के बावजूद तत्कालीन कुलसचिव ने विज्ञापन संख्या Rectt.-1/2014 दिनांक 08 सितंबर 2014 जारी करते समय पांच वर्ष के शोध अनुभव की शर्त को विज्ञापन में शामिल कर दिया, जबकि उस समय तक उक्त पात्रता को किसी भी वैधानिक शैक्षणिक निकाय की स्वीकृति प्राप्त नहीं हुई थी।एसएफआई ने आगे आरोप लगाया है कि 17–18 मार्च 2015 को स्क्रीनिंग समिति की बैठक विश्वविद्यालय की भर्ती शाखा के बजाय संबंधित विभाग में आयोजित की गई। संगठन का कहना है कि विज्ञापन में पांच वर्ष के शोध अनुभव को अनिवार्य पात्रता बनाया गया था, फिर भी स्क्रीनिंग समिति ने ऐसे अभ्यर्थियों को भी शॉर्टलिस्ट किया जिनके पास यह अनिवार्य अनुभव नहीं था। शिकायत के अनुसार पांच वर्ष के शोध अनुभव की शर्त पूरी करने वाला केवल एक ही अभ्यर्थी था, जबकि चयन समिति के समक्ष पर्याप्त संख्या में अभ्यर्थियों को प्रस्तुत करने के उद्देश्य से कथित रूप से अपात्र उम्मीदवारों को भी शॉर्टलिस्ट किया गया।एसएफआई का आरोप है कि इसके बाद 27 जून 2015 को आयोजित चयन समिति की बैठक में अंततः उसी अभ्यर्थी का चयन किया गया जो पांच वर्ष के शोध अनुभव की शर्त पूरी करता था।संगठन ने अपनी शिकायत में इसे सबसे गंभीर तथ्य बताते हुए कहा है कि जिस अतिरिक्त पात्रता के आधार पर पूरी भर्ती प्रक्रिया संचालित की गई, उसी पात्रता पर संबंधित शैक्षणिक निकायों ने भर्ती प्रक्रिया समाप्त होने के बाद विचार किया। शिकायत के अनुसार 22 अगस्त 2015 को बोर्ड ऑफ स्टडीज तथा बाद में संकाय और 19 मई 2016 को अकादमिक परिषद ने पांच वर्ष के शोध अनुभव की अतिरिक्त शर्त को स्वीकार नहीं किया। इन निकायों ने स्पष्ट किया कि सहायक प्रोफेसर एवं एसोसिएट प्रोफेसर के पदों के लिए वही योग्यताएं लागू होंगी जो विश्वविद्यालय द्वारा समय-समय पर अपनाए गए यूजीसी विनियमों में निर्धारित हैं।
एसएफआई का कहना है कि यदि शिकायत में उल्लिखित तथ्य जांच में सही पाए जाते हैं तो यह केवल प्रशासनिक त्रुटि नहीं, बल्कि वैधानिक प्रक्रियाओं की अवहेलना, सार्वजनिक पद के दुरुपयोग तथा भर्ती प्रक्रिया में गंभीर अनियमितता का मामला है। संगठन ने मांग की है कि तत्काल एफआईआर दर्ज कर निष्पक्ष एवं समयबद्ध आपराधिक जांच कराई जाए तथा यदि विश्वविद्यालय को किसी प्रकार की वित्तीय हानि हुई है तो उसकी वसूली भी जिम्मेदार अधिकारियों से की जाए।एसएफआई ने विश्वविद्यालय प्रशासन से हाल ही में लागू की गई फीस वृद्धि को तत्काल वापस लेने की भी मांग की है। संगठन का कहना है कि एक ओर विश्वविद्यालय लगातार छात्रों पर आर्थिक बोझ डाल रहा है, वहीं दूसरी ओर भर्ती प्रक्रियाओं में कथित अनियमितताओं और प्रशासनिक जवाबदेही के गंभीर प्रश्न सामने आ रहे हैं। ऐसे में छात्रों पर अतिरिक्त आर्थिक भार डालने के बजाय प्रशासन को पारदर्शिता, जवाबदेही और सुशासन सुनिश्चित करना चाहिए।
एसएफआई ने कहा कि उसकी शिकायत किसी अनुमान, अफवाह या राजनीतिक आरोप पर आधारित नहीं है, बल्कि विश्वविद्यालय की संबंधित शाखाओं से विधिवत प्राप्त आधिकारिक अभिलेखों, कार्यकारी परिषद, बोर्ड ऑफ स्टडीज, संकाय तथा अकादमिक परिषद के निर्णयों एवं भर्ती प्रक्रिया से संबंधित दस्तावेजों के अध्ययन पर आधारित है। संगठन का दावा है कि उपलब्ध अभिलेख प्रथम दृष्टया यह संकेत देते हैं कि तत्कालीन कुलसचिव ने कार्यकारी परिषद के स्पष्ट निर्देशों की अवहेलना करते हुए बिना वैधानिक स्वीकृति के अतिरिक्त पात्रता शर्त विज्ञापन में शामिल की और उसी आधार पर पूरी भर्ती प्रक्रिया संचालित की गई।एसएफआई का आरोप है कि इस कथित कार्रवाई से उन अनेक अभ्यर्थियों के साथ गंभीर भेदभाव हुआ जो विश्वविद्यालय एवं यूजीसी द्वारा निर्धारित वास्तविक पात्रता के अनुसार आवेदन करने और चयनित होने के अधिकारी थे। संगठन का कहना है कि यदि निष्पक्ष जांच में शिकायत के तथ्य सही पाए जाते हैं, तो यह समान अवसर के सिद्धांत और विधिसम्मत भर्ती प्रक्रिया दोनों का गंभीर उल्लंघन होगा।एसएफआई ने पुलिस प्रशासन से मांग की है कि तत्कालीन कुलसचिव के विरुद्ध अविलंब प्राथमिकी दर्ज कर निष्पक्ष एवं समयबद्ध जांच कराई जाए। साथ ही, जांच में दोष सिद्ध होने पर संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध कठोर वैधानिक कार्रवाई करते हुए।विश्वविद्यालय को हुई समस्त वित्तीय हानि की वसूली सुनिश्चित की जाए।संगठन ने कहा कि हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय प्रदेश की सर्वोच्च उच्च शिक्षण संस्था है और इसकी विश्वसनीयता, पारदर्शिता तथा शैक्षणिक गरिमा की रक्षा करना प्रशासन की सर्वोच्च जिम्मेदारी है। एसएफआई ने स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालय को भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और मनमानी से मुक्त कर पारदर्शी एवं उत्तरदायी संस्थान बनाने के लिए उसका संघर्ष आगे भी जारी रहेगा।











