April 14, 2026 5:16 pm

संघ के संस्कार और सेवा की भावना ने मुझे वनवासी क्षेत्रों में काम करने की प्रेरणा दी: डॉ. राजीव बिंदल

शिमला,मार्च।भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल ने एक विस्तृत वक्तव्य में अपने जीवन के उस महत्वपूर्ण अध्याय को साझा किया, जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्कार और सेवा भाव ने उन्हें झारखंड के आदिवासी क्षेत्रों में समाज सेवा के कार्य से जोड़ दिया। उन्होंने कहा कि आज जब झारखंड के गोयलकेरा स्थित वनवासी कल्याण केन्द्र के छात्रावास के नए भवन का उद्घाटन होने जा रहा है, तो लगभग 46 वर्ष पुरानी स्मृतियाँ पुनः ताजा हो उठी हैं।
डॉ. बिंदल ने बताया कि वर्ष 1978 में जी.ए.एम.एस. की डिग्री प्राप्त करने के बाद स्वाभाविक रूप से उनका मन चिकित्सा अभ्यास शुरू करने का था और उसी दिशा में तैयारी भी चल रही थी। इसी दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन प्रांत प्रचारक माननीय श्री नारायण दास जी उनके सोलन स्थित घर आए और उनके पूज्य पिताजी स्वर्गीय वैद्य बालमुकंद जी से आग्रह किया कि परिवार से एक डॉक्टर को आदिवासी क्षेत्रों में सेवा कार्य के लिए भेजा जाए। उस समय परिवार में उनके बड़े भाई डॉ. रवि बिंदल और उनसे बड़े भाई डॉ. राम अवतार बिंदल भी चिकित्सा क्षेत्र में थे।उन्होंने कहा कि उस समय देश के आदिवासी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण की घटनाएं हो रही थीं और वनवासी कल्याण आश्रम के माध्यम से सेवा कार्यों को विस्तार दिया जा रहा था। ऐसे में परिवार में लंबी चर्चा के बाद उनके पिताजी ने निर्णय लिया कि डॉ. राजीव बिंदल को आदिवासी क्षेत्रों में सेवा कार्य के लिए भेजा जाए। अगले ही दिन प्रातः उन्हें इस सेवा कार्य के लिए विदा कर दिया गया।डॉ. बिंदल ने कहा कि यह निर्णय उनके जीवन का एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। उन्होंने बताया कि वर्ष 1975 में आपातकाल के दौरान विरोध करने के कारण उन्हें करनाल जेल में भी बंद किया गया था। जेल से बाहर आने के बाद यह माना जा रहा था कि वे चिकित्सा अभ्यास के साथ राजनीतिक जीवन में प्रवेश करेंगे, लेकिन संघ के संस्कार और सेवा की भावना ने उन्हें झारखंड के वनवासी क्षेत्रों की ओर अग्रसर कर दिया।उन्होंने बताया कि उस समय यह क्षेत्र झारखंड नहीं बल्कि दक्षिण बिहार का सरंडा का घना जंगल था। वे सिंहभूम जिले के कदमडिहा गांव पहुंचे, जहां ‘‘हो’’ जनजाति के बीच उन्होंने एक छोटा सा चिकित्सालय शुरू किया। भाषा, खान-पान और जीवनशैली की कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने आदिवासी समाज के साथ रहकर उनके दुख-दर्द को समझा और सेवा कार्य प्रारंभ किया।डॉ. बिंदल ने कहा कि धीरे-धीरे सेवा कार्य का विस्तार हुआ और कदमडिहा के बाद कुईड़ा तथा गोयलकेरा में भी चिकित्सालय स्थापित किए गए। हरियाणा से मिली यजदी जावा मोटरसाइकिल पर वे दूर-दूर तक आदिवासी क्षेत्रों में घूमकर चिकित्सा सेवा प्रदान करते थे। इस दौरान वनवासी कल्याण आश्रम का कार्य भी निरंतर बढ़ता गया।उन्होंने बताया कि एक समय उनके पूज्य पिताजी स्वर्गीय वैद्य बालमुकंद जी स्वयं सोलन से गोयलकेरा पहुंचे और वहां की परिस्थितियों को देखकर भावुक हो उठे। उन्होंने पूछा कि आगे क्या कार्य करना है। तब डॉ. बिंदल ने बताया कि गरीब आदिवासी बच्चों के लिए 20 बच्चों का एक छात्रावास शुरू करने की योजना है, जिस पर लगभग एक लाख रुपये वार्षिक खर्च आएगा, जो उस समय बहुत बड़ी राशि मानी जाती थी।डॉ. बिंदल ने बताया कि उनके पिताजी ने तुरंत कहा कि कार्य शुरू करो, धन की चिंता मत करो। उनके प्रोत्साहन और सहयोग से गोयलकेरा में छात्रावास शुरू हुआ और बाद में 1980 से लेकर 2001 तक उस छात्रावास का पूरा खर्च बिंदल परिवार द्वारा वहन किया गया।उन्होंने कहा कि आज उन्हें अत्यंत प्रसन्नता है कि जो सेवा कार्य 46 वर्ष पहले शुरू हुआ था, वह अब 200 आदिवासी बच्चों के छात्रावास के रूप में विकसित हो चुका है। गुजरात के एक दंपति ने इस छात्रावास के नए भवन के निर्माण का पुण्य कार्य अपने हाथों में लेकर इसे पूर्ण किया है।डॉ. बिंदल ने बताया कि 10 मार्च को वे अपनी पत्नी श्रीमती मधु बिंदल के साथ गोयलकेरा जाकर छात्रावास के नए भवन के उद्घाटन कार्यक्रम में शामिल होंगे। उन्होंने कहा कि यह उनके जीवन के सबसे भावनात्मक और संतोषजनक क्षणों में से एक होगा, क्योंकि यह सेवा कार्य उनके पूज्य माता-पिता के आशीर्वाद से प्रारंभ हुआ था और आज भी आगे बढ़ रहा है।उन्होंने कहा कि वनवासी कल्याण आश्रम में कार्य करने से उनके जीवन की दिशा समाज सेवा की ओर मुड़ी और सेवा का यह भाव आज भी उनके जीवन का मूल आधार है।डॉ. बिंदल ने इस अवसर पर वनवासी कल्याण आश्रम के संस्थापक बाबा साहेब देशपांडे जी को नमन किया तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक परम पूजनीय श्री माधव सदाशिवराव गोलवलकर ‘गुरूजी’ को वंदन करते हुए कहा कि उनकी प्रेरणा से ही यह सेवा कार्य प्रारंभ हुआ और देशभर में लाखों वनवासी परिवारों तक सेवा की भावना पहुंची।
अंत में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सभी प्रचारकों को नमन करते हुए अपने पूज्य पिताजी स्व. वैद्य बालमुकंद बिंदल जी और माताजी स्व. श्रीमती भागवंती बिंदल जी के चरणों में श्रद्धापूर्वक नमन किया, जिनके आशीर्वाद और संस्कारों ने उन्हें सेवा और राष्ट्रकार्य के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।

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