शिमला। हिमालय की पहाड़ियों पर देवदार के वृक्षों के बीच लाल रंग का बुरांश अनुपम छटा बिखेरता है. मार्च और अप्रैल महीने में पहाड़ इस फूल की लाली और खुशबू से महक उठते हैं. बुरांश के खिलने से पतझड़ से ऊबा जंगल भी खिल उठता है. मार्च और अप्रैल के महीनों में पहाड़ इसके फूलों के रंग से सराबोर हो जाते हैं. बुरांश को हिमाचल में ‘बराह’ के नाम से भी जाना जाता है। शिमला, कांगड़ा, सोलन, धर्मशाला और किन्नौर में इस फूल का प्रयोग अचार, मुरब्बा, जूस के रूप में किया जाता है. ये पौधा प्राकृतिक रूप से उगता है. धर्मशाला में चिन्मय संत तपोवन में इस फूल की नर्सरी है और भारत के अनेक भागों में इसकी सप्लाई की जाती है. बुरांश एक सदाबहार पेड़ है जो समुद्र तल से 1500-3600 मीटर की ऊंचाई पर उगता है. पहाड़ी इलाकों में अप्रैल से मई के महीनों में खिलने वाला बुरांश का फूल इस बार जनवरी के आखिरी महीने में ही खिल गया. ये कोई बुरांश और प्राकृति के लिए शुभ समाचार नहीं है, बल्कि चिंता का विषय है। आपने देखा होगा कि अप्रैल और मई के महीने में पहाड़ बुरांश के फूलों के रंग से लाल हो जाते हैं, लेकिन इस बार की तस्वीरें कुछ और ही है. इस बार समय से पहले ही बुरांश के फूल खिल गए, जो कहीं न कहीं चिंता का कारण है. बुरांश के पेड़ को रोडोडेंड्रॉन के नाम से भी जाना जाता है. आमतौर पर पहाड़ के जंगलों में बुरांश का फूल 15 मार्च के बाद ही खिलता है. मगर अब प्रकृति अपना अलग रंग दिखा रही है।












